कल रात बिजली गुल थी,
देर रात थी, आधी रात -
बस यूँ समझिए,
अँधेरे से मेरी थोड़ी आपस की बात थी।
कमरे की खिड़की से
घुप्प अँधियारे में,
मई की तपती साँसों के बीच,
एक शीतल रोशनी चुपके-चुपके
फर्श पर उतर आई थी।
लगा -
कोई पुराना अपना है,
जो बिना आहट दिए
घर का रास्ता जानता हो।
मैंने भी जवाब में
खिड़की से बाहर एक झाँक लगाई,
तो ऊपर देखा -
चाँद था,
मंद-मंद मुस्काता हुआ।
ना कोई जल्दी,
ना कोई शिकवा,
बस वही पुरानी अदा -
जैसे कह रहा हो,
"का हो बाबू, चीन्हे कि नहीं?"
हमने नज़रें मिलाईं,
वो मुस्काता रहा।
मैंने नज़रें चुराईं,
वो फिर भी मुस्काता रहा।
और जब मैं लौटने को हुआ,
ठीक उसी घड़ी,
यकायक लगा -
चाँद मुझे चिढ़ा रहा है,
पुराने दिनों की गठरी खोलकर
एक-एक बात याद दिला रहा है।
बोला -
"जाने वो कैसा दौर था रे,
जब तुम और मैं
घंटों बतियाते थे।ख़ासकर
उमस और तपन वाले दिनों में,
जब घरों की दीवारें भी पसीजती थीं,
और रात
आँगन में चारपाई बिछाकर
धीरे-धीरे खुलती थी।तुम नीचे लेटे रहते,
मैं ऊपर से ताकता रहता।
तुम अपनी चिंताओं को
ताख़े पर रख देते,
और मुझे निहारते-निहारते
नींद की देहरी पार कर जाते।कभी चुपचाप,
कभी बतियाते-बतियाते,
कभी यूँ ही -
जैसे मेरी रोशनी
तुम्हारी माँ की थपकी हो।"
फिर चाँद ने
थोड़ा मुँह फुलाकर कहा -
"बड़े हो गये हो बहुत तुम,
दूर भी बहुत निकल गये हो।अब देखते तक नहीं मेरी ओर,
निहारते तक नहीं।
खिड़कियाँ तो हैं तुम्हारे पास अब भी,
पर झाँकने की फुर्सत कहाँ?रोशनी बहुत जमा ली तुमने,
पर चाँदनी से
रिश्ता कम कर लिया।"
मैं चुप रहा।
कमरे में अँधेरा था,
पर भीतर
एक पुरानी उजास जल रही थी।
बिजली अब भी गुल थी,
मगर उस रात
मेरे कमरे में
चाँद नहीं आया था सिर्फ़ -
मेरा बचपन भी
धीरे से खिड़की पर बैठ गया था।

