अजब तदबीर लिखी है वक़्त ने मेरे हिस्से में-
जहाँ तूफ़ानों की लगाम भी मेरी मुट्ठी पहचानती है,
वहीं एक ख़ामोश लहर है
जो हर रोज़ मेरी हिम्मत को डुबो जाती है।
हज़ारों फ़ैसलों का बोझ उठाकर भी मुस्कुरा लेता हूँ,
मगर एक अधूरी याद का वज़न
मेरे कंधों से उतारा नहीं जाता।
लोग मेरी फ़तहों का हिसाब रखते हैं,
मैं अपनी शिकस्तों का गवाह हूँ।
उन्हें मेरा क़द दिखाई देता है,
मुझे अपने भीतर का खालीपन।
एक पूरा सफ़र अभी मेरी राह तक रहा है,
मगर यह एक ठहरा हुआ पल
हर रोज़ मेरा रास्ता रोक लेता है।
क़दम आगे बढ़ते हैं,
दिल वहीं ठिठक जाता है।
मैंने दुनिया को सँभालने के फ़न सीख लिए,
रिश्ते, ज़िम्मेदारियाँ, ख़्वाब, उम्मीदें-सब निभा लिए;
बस अपने ही भीतर बिखरे एक कोने को
आज तक समेट नहीं पाया।
शायद इंसान होने का सच यही है-
कि कभी अपनी ताक़तों से नहीं,
अपनी नाकामियों से पहचाना जाता है;
और सबसे कठिन जंग वह होती है
जिसमें सामने कोई दुश्मन नहीं,
सिर्फ़ अपना ही दिल खड़ा होता है।
